यही है दास्ताँ अपनी, के हम हैं ख़ाक से निकले
कोई हमको उठा कर के निगाह ए पाक में रख ले
बहुत आंसू बहाए हैं, महज़ है आरज़ू इतनी
कभी अपनी कहानी भी किसी के आँख में पिघले
रगों में दौड़ते हैं राख, दिल दिन-रात जलता है
कोई सैलाब चुपके से मुझे आगोश में भर ले
ज़मीं ख़्वाबों की सूखी है, उम्मीदें टूट के बिखरी
कोई बादल रहम कर दे, कोई पौधा कभी निकले
बहुत आंसू बहाए हैं, महज़ है आरज़ू इतनी
ReplyDeleteकभी अपनी कहानी भी किसी के आँख में पिघले
bahut khoob