Sunday, July 25, 2010

ग़ज़ल

यही है दास्ताँ अपनी, के हम हैं ख़ाक से निकले
कोई हमको उठा कर के निगाह ए पाक में रख ले

बहुत आंसू बहाए हैं, महज़ है आरज़ू इतनी
कभी अपनी कहानी भी किसी के आँख में पिघले

रगों में दौड़ते हैं राख, दिल दिन-रात जलता है
कोई सैलाब चुपके से मुझे आगोश में भर ले

ज़मीं ख़्वाबों की सूखी है, उम्मीदें टूट के बिखरी
कोई बादल रहम कर दे, कोई पौधा कभी निकले

1 comment:

  1. बहुत आंसू बहाए हैं, महज़ है आरज़ू इतनी
    कभी अपनी कहानी भी किसी के आँख में पिघले
    bahut khoob

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