Thursday, July 29, 2010

आज़ादी

बीते कल की बात -
नेताजी ने कहा
तुम मुझे दो खून
मैं दूंगा तुम्हें
आज़ादी...

और,
आज की बात -
नेताजी मांगते नहीं
पूरे अधिकार से
ज़बरन/बेहिचक
खून
चूस लेते हैं
और आज़ादी मांगो तो
मुस्कुराते हुए
अंगूठा
दिखा देते हैं....

Sunday, July 25, 2010

ग़ज़ल

यही है दास्ताँ अपनी, के हम हैं ख़ाक से निकले
कोई हमको उठा कर के निगाह ए पाक में रख ले

बहुत आंसू बहाए हैं, महज़ है आरज़ू इतनी
कभी अपनी कहानी भी किसी के आँख में पिघले

रगों में दौड़ते हैं राख, दिल दिन-रात जलता है
कोई सैलाब चुपके से मुझे आगोश में भर ले

ज़मीं ख़्वाबों की सूखी है, उम्मीदें टूट के बिखरी
कोई बादल रहम कर दे, कोई पौधा कभी निकले

एक और दुनिया

उठो मित्र
सर उठाओ
अपनी इधर की उदासी
पीछे छोडो
और
आगे देखो
उधर की ओर

देखो चमकता हुआ सूर्य
स्कूल बस में बैठे
चहकते हुए बच्चे
मुस्कराते हुए
रिकशे/टैक्सी/ठेले वाले
ठहाके लगाते
मुटिया मजदूर
गुनगुनाते हुए हल जोतते
खेतों में किसान
कोयल की कू कू
परिंदों के गुटर गू

तुम्हारी दुनिया से परे
एक और भी है दुनिया
तुम्हारे आस पास
बहुत नज़दीक
जहां -
हंसी/मुस्कराहट/ उल्लास
मुफ्त में मिलती है
दो वक्त की रोटी के साथ

उठो मित्र
सर उठाओ
हिम्मत करो
और रखो कदम
सीमा के पार ..

Saturday, July 24, 2010

नींद

मेरी नींद
कभी खून
कभी पसीने
के साथ
बह जाती है

रात में
आँखों से
आंसुओं के साथ
टपक जाती है

जब आंसू
सूखते हैं
नींद भी
सूख जाती है
अश्कों के जनाज़े में
नींद भी
सिमट जाती है...

परिवर्तन

घिरे हो क्यों अंधेरों से
सलाखें तोड़ कर निकलो !
उजालों की कमी क्या है
दिशा बदलो, दशा बदलो !!

अकेले तुम नहीं रण में
उठो, इतिहास रच डालो !
सही अब भी बहुत कुछ है
दिशा बदलो, दशा बदलो !!