वैसे तो कई बार इस तरह की घटनाएं घट चुकी थी इस देश में। कई बार तो समीर ख़ुद रात-रात भर जाग कर टेलिविज़न चैनलों में समाचार देखा करता था। कुछ दिनों तक दोस्तों के साथ चर्चा-परिचर्चा होती थी और हर कोई इन सब बातों को भूल कर अपने-अपने जीवन की गाड़ी चलाने में मशगूल हो जाता था।
मगर इस बार ऐसा नहीं था। इस बार यह दूसरों के साथ हुई त्रासदी की ख़बर मात्र नहीं थी। इस बार तो वह ख़ुद भी जुड़ा हुआ था इस त्रासदी से। इस बार इस भयानक पटकथा का एक चरित्र कोई अपना था न!
हाँ, अपना ही तो था रमेश! खून का रिश्ता नहीं था, पर पिछले चार महीनों में यह रिश्ता अनायास ही रक्त-सम्बन्ध से भी प्रगाढ़ हो गया था। समीर को अचरज होता था की कैसे उस गंवार ने अपने आप को उसके परिवार का अभिन्न अंग बना लिया था।
बेचैन सा करवटें बदल रहा था समीर। नींद के गोद में समा कर उसके यादों से दूर भागने की सारी कोशिशें बेकार साबित हो रही थी। कुछ देर यूँ ही करवटें बदलते-बदलते वह सहसा उठ कर बैठ गया। अपने कमरे में झाँक कर देखा तो पाया की उमा सो रही थी। आख़िर डॉक्टर का दिया हुआ नींद का इंजेक्शन ने असर किया था। सारे दिन में कितनी बार बेहोश हुई थी उमा, इसकी गिनती वो भूल चुका था। बंटू हमेशा की तरह आराम से सो रहा था। अच्छा था वो अभी बड़ा नहीं हुआ था। आखिर एक ३ साल के बच्चे की समझ ही कितनी होती है? मगर जब वो कल फिर पूछेगा अपने रमेश चाचा के बारे में तो उसे वह क्या उत्तर देगा? कब तक बहलाता रहेगा वो बंटू को?
समीर ने फ्रिज से बोतल निकाल कर दो घूँट पानी पिया और बालकनी में जा बैठा। वह रमेश की यादों से जितनी दूर भागना चाह रहा था, रमेश की यादें उसे उतना ही परेशान किए जा रही थीं।
अभी कुछ चार महीने पहले की ही तो बात थी।
रविवार का दिन था और वह सुबह को यहीं पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था जब हरीश का फ़ोन आया था। पटना साइंस कॉलेज में साथ ही पढ़े थे दोनों। हॉस्टल में भी एक ही कमरे में रहते थे। बी एस सी करके जब तक अपने अपने शहर वापस नहीं जाना पड़ा था तब तक कभी सोचा भी नहीं था की ज़िन्दगी अलग अलग गुज़ारनी पड़ेगी दोनों को।
और आज इतने दिनों के बाद उसी हरीश का फ़ोन आया था।
"और, कैसे हो समीर ?", हरीश ने एक अजीब सी सुस्ती के साथ प्रश्न किया था। कुछ ऐसे जैसे की वो प्रश्न एक जिज्ञासा न होकर एक फोर्मलिटी मात्र हो।
" एकदम बढ़िया! और तुम अपनी सुनाओ, कैसे हो? आज इतने दिनों के बाद कैसे याद किया?", समीर के शब्दों में कहीं भी कोई सुस्ती नहीं दिख रही थी।
" ठीक ही हूँ। या यूँ कहूं कि सब कुछ ठीक नहीं है।"
" अरे भई क्या बात है? साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते?"
" रमेश को लेकर बड़ा परेशान रहता हूँ यार! रमेश को तो जानते ही होगे - मेरा छोटा भाई।"
"हाँ तुम बताया करते थे उसके बारे में हॉस्टल में। मगर बात क्या है?" समीर की कौतूहल बढती जा रही थी।
"अब क्या बताऊँ!" हरीश की आवाज़ में परेशानी साफ़ झलक रही थी। मीलों दूर बैठा समीर फ़ोन पर ही यह सब महसूस कर पा रहा था। " २५ साल का हो गया है मगर अभी भी निठल्ला बैठा है। हमारे छोटे से शहर में कोई गुंजाईश नहीं है उसके लिए। रांची भी भेजा था भइया के पास, मगर वहाँ भी कुछ नहीं हो पाया। होता भी कैसे! एकदम गंवार सा है अभी भी। किसी तरह बी ऐ तो पास कर लिया है उसने, मगर व्यावहारिक तौर पर जस का तस है।"
" मैं कुछ कोशिश करूं उसके लिए?" समीर को यह पूछने के लिए सोचना भी नहीं पड़ा था।
खुशी से आँखें भर आयीं थीं हरीश की! "मेरे कुछ बताये बिना ही कैसे समझ लेते हो यार तुम मेरे मन की बात? अरे इसी लिए तो फ़ोन किया था तुम्हें!" हरीश की आवाज़ में अब परेशानी की नहीं, खुशी की झलक मिल रही थी। " मगर सोचा भी नहीं था कि इतनी आसानी से तुम मेरा ये बोझ उतार दोगे"
"कैसी बातें कर रहे हो हरीश! रमेश जैसे तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी तो है। और फिर मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि उसे यहाँ नौकरी मिल ही जायेगी। 'जॉब मार्केट' की हालत तो तुम भी जानते ही हो। मगर हाँ, कोशिश ज़रूर करूंगा। बी ऐ के बाद भी कुछ किया है उसने?"
हरीश बहुत हल्का महसूस कर रहा था। बड़े उत्साहित होकर कहा था उसने " हाँ अभी कुछ दिन पहले ही उसने आई टी आई की ट्रेनिंग की है।"
"अच्छा तो तुम मुझे ज़रा उसका बायो डाटा कुरिअर कर दो। नहीं! एक काम करो, तुम उसे ही भेज दो यहाँ। कहना अपने सारे प्रमाणपत्र लेकर आए।"
हरीश ने तपाक से कहा था "कल ही बंदोबस्त करता हूँ उसके जाने का। बस तुम ज़रा ख्याल रखना उसका। वैसे मैं जानता हूँ तुम्हें ये कहने की ज़रूरत नहीं है। मगर क्या करूं, छोटा भाई है न! मगर तुम्हारे पास भेजकर मैं तो यही समझूंगा की एक घर से उसे दूसरे घर भेज रहा हूँ। अपनों के बीच ही तो जा रहा है!"
'अपनों के बीच।' ठीक ही तो कहा था हरीश ने। बिल्कुल अपना बन बैठा था रमेश इतने ही दिनों में।
फिर समीर को याद आया जब वह पहली बार उसके घर आया था।
सुबह का समय था। समीर अभी पूजा करके उठा ही था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसे कुछ आश्चर्य हुआ। आम तौर पर कोई आता था तो 'डोर बेल' बजाता था। इस तरह दस्तक देकर तो दूधवाला भी नहीं आता था। और वैसे भी दूधवाला और अखबारवाला दोनों आकर चले गए थे। उमा भी रसोई से निकल कर आ गई थी। मगर दरवाजा समीर ने ही खोला था, और सामने एक अजनबी को पाया था।
"आप समीर भइया हैं न!" आगंतुक नें अपनत्व भरे मुस्कराहट के साथ सहज ही पूछ लिया था।
"हाँ, मगर आप कौन....."
समीर ने अपना प्रश्न पूरा भी नहीं किया था कि रमेश कह उठा " अरे भइया हम रमेस हैं, हरिस भइया के छुटके भाई। पटना से आए हैं। भइया ने फ़ोन नहीं किया था आपको ?"
" ओह! अन्दर आओ। हाँ फ़ोन तो किया था, मगर यह नहीं बताया था की तुम आज ही आ रहे हो।"
समीर ने उसे सोफे पर बिठाया और उसका अटैची 'गेस्ट रूम' में रख दिया। वापस लौटते वक्त उसे उमा ने रसोई में बुला लिया था।
" कल फ़ोन आया था हरीश भाई साहब का। मैं तुम्हें बताना भूल गई थी। कह रहे थे की तुम्हें फ़ोन किया था मगर तुम्हारा मोबाइल बंद था। उन्होंने बताया था कि रमेश को ट्रेन में बिठा कर आ रहे हैं। सुबह तक यहाँ पहुँच जायेगा। सॉरी, तुम्हें बताना एकदम भूल गई।"
"कोई बात नहीं। ज़रा उसके लिए भी कुछ चाय-नाश्ता बना देना। मैं देखता हूँ उधर।"
रमेश ड्राइंग रूम में इधर उधर आचरज के साथ देख रहा था। समीर के आते ही उसने कहा था "बड़ा फस्ट किलास घर है आपका समीर भइया। एकदम सिनेमा जैसा। अपना है कि किराए का है?"
बड़ा अजीब सा लगा था ये सुनकर समीर को। कोई अजनबी पहली बार में ही ऐसा सवाल कैसे कर सकता है? बड़ा ही धृष्ट इंसान है! "अपना ही फ्लैट है। तीन साल पहले लिया था" समीर ने धीरे से कहा था.
रमेश चहक उठा था " बहुत्ते अच्छा किया भइया जो खरीद लिए। हरिस भइया तो किराए पर ही रहते हैं। बताइये तो पईसा भी देते हैं और घर भी अपना नहीं है! बड़ा बदमास है मकान वाला। एकठो कांटी भी नहीं ठोकने देता है बदमसबा। अपना घर में तो जो मर्जी किए, नहीं?"
" हाँ वो तो है, पर तुम्हें यहाँ पहुचने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?" समीर ने शिष्टतावश पूछ लिया था।
"अरे का कहते हैं समीर भइया! रेलगाडी से उतर कर टेम्पू पर बैठे और जो कागज़ पर पता लिख कर हरिस भइया दिए थे, उसको ड्रेभर को दिखा दिए। और ऊ पहलमान एक्के बार में यहाँ पहुँचा दिया। नीचे दर्बनमा को कागज दिखाए तो दरबज्जा तक छोड़ कर चला गया। बड़ा भला आदमी मालूम पड़ता है, नहीं?"
बड़ा अजीब सा लग रहा था समीर को। हरीश तो बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। यह ऐसा कैसे निकल आया! अब समझ में आ रहा था समीर को की इस इंसान को नौकरी क्यों नहीं मिल रही है।
उमा नाश्ता लेकर आ गई थी। उसे देख कर रमेश फिर चहक उठा " आप भौजी हैं न! परनाम भौजी। अरे ई सब का ले आए! लेकिन ठीके किए जो ले आए। बहुत भूख लगा है। लेकिन हम तो अभी मुंह भी नहीं धोये हैं, नहाए भी नहीं हैं। खाएं कैसे, नहीं?"
समीर को अब ख़ुद पर गुस्सा आ रहा था। क्यों बुलाया उसने इसे यहाँ। 'बायो डाटा' ही माँगा लेता, बाद में देखा जाता। उसे लग रहा था की आज तो उमा बरस पड़ेगी उसपर की कैसे जाहिल को बुला लिया है घर पर। मगर उसे याद आया की बड़े विश्वास से हरीश ने अपने भाई को उसके पास भेजा है। उसके अपने हरीश ने।
"नहाने धोने में तो बहुत वक्त लग जायेगा। तब तक तो नाश्ता ठंडा हो जायेगा!" उमा के स्वर में झल्लाहट साफ़ नज़र आ रहा था। " आप ऐसा कीजिये कि मुंह धो लीजिये, नहा बाद में लीजियेगा।"
"ठीके कह रहीं हैं भौजी। नास्ता तो ठंडा हो न हो, पहले तो हमही भूख से ठंडे पड़ जायेंगे नहीं? ही! ही!" और हँसता हुआ रमेश अपने अटैची के तरफ़ बढ़ गया था।
समीर ने उमा को समझाना चाहा था "देखो उमा......"
और उमा ने अपने गुस्से को किसी तरह से दबा कर कहा था " अभी आप ऑफिस जाइये। शाम को बात करेंगे।"
समीर ने फिर कुछ नहीं कहा था। चुप चाप नाश्ता करके दफ्तर चला गया था। मगर काम में जी नहीं लग रहा था। सोचता रहा दिन भर की कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई उससे। पता नहीं आज उमा से क्या-क्या सुनना पड़ेगा। उसने उमा से एक बार पूछा भी नहीं तो नहीं था रमेश को बुलाने से पहले! मगर पूछने की ज़रूरत ही क्या थी? आख़िर हरीश का भाई था। कितनी मदद की थी हरीश ने हॉस्टल के दिनों में। क्या वह उसके लिए इतना भी नहीं कर सकता? और उसने हरीश से कह भी तो दिया था की कोशिश ही कर सकता है। कोई वादा तो नहीं किया था। मगर यह जाहिल! कैसे संभालेगा इस परिस्थिति को वह? हे भगवान्!"
और डरता-डरता घर पहुँचा था शाम को वह। किसी तूफ़ान के आशंका में।
अन्दर जाकर देखा तो पाया था कि रमेश गेस्ट रूम में लेटा हुआ है और उमा उसके दाहिने पाँव में आयोडेक्स मल रही है।
समीर भौंचक्का रह गया था। बैग को बगल के टेबल पर फैंक कर उसने उमा से पूछा " क्या हुआ?"
रमेश फिर चहक उठा " अरे भइया आप गए! अरे कुछो नहीं हुआ है। बस जरा सा मोच आ गया है और भौजी बेकारे परेसान हुए जा रही हैं। हम तो कबसे मना कर रहे हैं लेकिन......"
"चुप रहो तुम! बिल्कुल चुपचाप लेटे रहो।" उमा उसे बिल्कुल वैसे ही डांट रही थी जैसे की बंटू को डाँटा करती थी। और फिर उसने समीर की तरफ़ देख कर अपने आंसू पोछते हुए कहा था " आज पता नहीं क्या हो जाता हमारे बंटू को अगर यह नहीं होता। नीचे सब्जी वाला आया था दोपहर में और मैंने आया को भेज दिया था कुछ सब्जी खरीदने। वह बंटू को लेकर चली गई। इधर वह सब्जी खरीद रही थी और उधर बंटू न जाने कैसे सड़क पर चला गया। रमेश भी नीचे ही था। पान खाने गया था। जब इसने टैक्सी को बंटू की ओर बढ़ते हुए देखा तो लपक कर उसे उठा कर दूसरी ओर कूद पड़ा। भगवान् का लाख लाख शुक्र है की बंटू को कुछ नहीं हुआ। मगर इससे चला नहीं जा रहा है। और कहता है की मामूली मोच है! बदमाश कहीं का! मेरे बच्चे की जान बचाई है इसने। हे भगवान्! आया का मैंने हिसाब कर दिया है!"
"ठीक ही तो किया आपने भौजी" रमेश ने उमा के चुप रहने के हुक्म को नज़रंदाज़ करते हुए कहा " आया-गया की का जरुरत है। हम कौन चीज के लिए हैं! अरे बंटू बाबू को हम घुमा दिया करेंगे। आप काहे परेसान होती हैं। और अइसा मोच तो हमको बहुत बार लगा है। कुच्छो नहीं होगा। अपने ठीक हो जाएगा ससुरा!"
और उस दिन से रमेश सिर्फ़ एक जाहिल गंवार नहीं रह गया था उस परिवार के लिए। वह तो एक देवदूत बनकर आया था। उमा का तो वो मानो बिछडा हुआ बेटा ही था जो बहुत दिनों के बाद घर लौट आया था।
और धीरे धीरे रमेश घुलता ही चला गया था उस परिवार के साथ। अब तो उसने इसे ही अपना घर मान लिया था। घर के हर छोटे बड़े काम कर दिया करता था। बाज़ार से राशन-सब्जी खरीदना, बंटू को प्रेप स्कूल तक छोड़ना और घर वापस लाना, उसे शाम को बहार से घुमा लाना, टेलीफोन और बिजली का बिल भरना, इत्यादि उसके रोजमर्रे के काम बन चुके थे। शुरू में समीर और उमा उसे यह सब करने से मना भी करते थे, मगर धीरे धीरे उन्होंने भी अपनी हार मान ली। और फिर अब तो वह इस घर का सदस्य था। उनका अपना था। उसे यह सब करने का अधिकार भी तो था!
कहता था "अरे भौजी, आप भी कईसा बात करते हैं। अरे पटना में भी तो ई सब हम ही न करते थे। अपना घर में तो ई सब करना ही न चाहिए, नहीं?"
इधर समीर ने उसके 'बायो डाटा' का सुधार करके अपने कुछ पहचान वालों को दे दिया था। वो लगातार इस कोशिश में था कि कहीं भी रमेश को कोई अच्छी नौकरी मिल जाए।
और उस दिन गुप्ता जी ने कहा था कि उनके कारखाने में बहाली हो रही है, रमेश को भेज दें 'इंटरव्यू' के लिए। उनके ऑफिस में ही होनी थी इंटरव्यू।
समीर ने बड़े उत्साह के साथ रमेश को यह ख़बर दिया था। "इंटरव्यू देना है, कुछ अच्छे कपड़े हैं या नहीं? घर में तो कुछ भी चल जाता है, मगर वहां एकदम टिप टॉप होकर जाना है समझे?"
रमेश ने दौड़ कर अपनी अटैची से कपड़े निकाल के दिखाए थे समीर को। नीले रंग की शर्ट और काली पतलून। इस्त्री कि हुई। "अरे भइया, हम सब तैयारी करके रखे हैं। आप घबराते काहे हैं। नोकरिया तो मिलबे करेगा। जाएगा कहाँ, नहीं?" उसने हँसते हुए कहा था।
समीर को भी लगा सब तो ठीक ही है। फिर उसे अचानक याद आया। "जूते हैं या नहीं?"
"चप्पल है न भइया। पालिस करा लेंगे। एकदम फस्ट किलास लगेगा, नहीं?"
समीर कुढ़ गया। "अरे बेवकूफ चप्पल पहनकर कोई इंटरव्यू देता है पगले? हे भगवान्, अब तक तो दूकान भी बंद हो गया होगा!"
उमा ने ही हल बताया था। "क्या हुआ दूकान बंद हो गए हैं तो? बाद में खरीद देना। कल तो तुम्हारे जूते भी पहनकर जा सकता है। वो बाटा वाला तो नया ही है। पहना भी कहाँ है तुमनें।"
और बस फ़ैसला हो गया उसके 'ड्रेस कोड' का। जाते वक्त उसने अटैची से निकाल कर समीर को अपनी घड़ी दिखलाई थी। पुरानी घड़ी थी - 'एच एम् टी रजत'-मगर बड़े जतन से रखा था उसे रमेश ने इसलिए पुरानी लग नहीं रही थी। बायीं कलाई पर बांधते हुए उसने कहा था "बाबूजी ने दिया था" और कहकर जाने क्यों शर्मा सा गया था वो।
उन दोनो के ही पैर छुए थे उसने जाने से पहले और उमा ने उसके माथे पर तिलक लगा दिया था। और जाते जाते पीछे मुड़कर उसने कहा था "भौजी घबराइये नहीं, हम तो मिठाई लेकर ही लौटेंगे, बंटू बाबू को तो जलेबी ही अच्छा लगता है, नहीं?"
उस दिन फिर दफ्तर में काम में दिल नहीं लग रहा था समीर का। वक्त जैसे ठहर सा गया था। उसने ख़ुद को समझाया भी कि यह कोई आखरी बहाली थोडी न हो रही है। अगर इस बार नौकरी नहीं भी मिली रमेश को तो क्या होगा? फिर कोई मिल जायेगी। मगर फिर भी वह दिल से चाह रहा था कि यह नौकरी उसे मिल जाए।
और फिर शाम को चार बजे के बाद आधे घंटे के अन्दर दो फ़ोन आए।
पहला फ़ोन गुप्ता जी का था। "बधाई हो शर्मा जी। आपके भाई साहब पास हो गए। कल से ही 'ज्वाइन' करना है कारखाने में। मिठाई बनती है भई!"
खुशी से उछल पड़ा था समीर। उसके दिल में आया कि वह तुंरत घर फ़ोन करके यह खुशखबरी उमा को दे। मगर फिर उसने ख़ुद को रोक लिया। घर जाकर उसे 'सरप्राइज़' देगा। तभी तो उसके चेहरे खुशी को देख पाएगा! और उससे रहा नहीं गया। निकल पड़ा घर के लिए।
आज उसने टैक्सी ले ली थी। अभी रास्ते में ही था कि मोबाइल बज उठा। घर से फ़ोन था। उसे लगा रमेश ने उमा को फ़ोन करके बता दिया है और उसने उसे खुशखबरी देने के लिए फ़ोन किया है। मगर फ़ोन पर उमा कि बातें सुनकर वह सन्न रह गया। उमा कि आवाज़ में दहशत भरी हुई थी "ग्रेटर कैलाश में बम ब्लास्ट हुआ है। टी वी पर दिखा रहे हैं। रमेश का इंटरव्यू भी तो वहीं था न? उसके पास तो मोबाइल भी नहीं है। उसने भी फ़ोन नहीं किया है। तुम जल्दी पता करो।" एक ही साँस में उसने सब कह दिया था और समीर ने ड्राईवर से ग्रेटर कैलाश के तरफ़ मुड़ने को कह दिया था।
भयंकर दृश्य था। चरों तरफ़ लोग गिरे पड़े थे। कोई कराह रहा था। कोई चिल्ला रहा था। और कुछ बिल्कुल चुप थे। रमेश घूम घूम कर देखने ला। लोग घायलों को अम्बुलेंस में लाद रहे थे। मगर उसकी आँखें जिसे खोज रही थीं वह कहीं नहीं दिख रहा था। कभी अपने आस पास देखता, और कभी नीचे पड़े हुए लोगों कि तरफ़।
और फिर उसने नीचे पड़े हुए एक शांत शरीर को देखा। मुंह झुलस गया था। मगर कपडों के कुछ अंश अभी भी साबुत थे। नीली शर्ट और काली पतलून। और उसने मन ही मन कहा था "नीले शर्ट और काले पतलून क्या कोई और नहीं पहन सकता!" मगर जूते? वो भी तो बिल्कुल जाने पहचाने से थे। "नहीं! नहीं! यह वो नहीं है, ऐसे जूते क्या कोई और नहीं पहन सकता?" मगर जब उसने जब उसके बायीं कलाई को देखा तो उसे लगा कि उसकी साँसे रुक सी रही हैं। 'एच एम् टी रजत' बंद हो गई थी। उसे लगा कि वह गिर पड़ेगा वहीं और फिर उसने देखा कि एक पुलिस वाला उसे संभाल रहा है। "क्या आप इसे पहचानते हैं?"
और रमेश के मुंह से बस इतना ही निकला "मेरा अपना है, मेरा भाई है।"
अस्पताल में डॉक्टरों नें पहुँचते ही अनिष्ट कि सूचना दे दी थी। 'पोस्ट मोर्टेम' के लिए ले गए थे उसकी लाश को.
समीर का मस्तिष्क सुन्न हो चुका था। पुलिस वालों ने उसके मोबाइल से नम्बर लेकर उसके दफ्तर में ख़बर कर दी थी। उसके कुछ सहकर्मियों ने ही उसे घर पहुंचाया था।
उमा सुनते ही बेहोश हो गई थी। किसी तरह होश में लाया भी जाता तो फिर अचेत हो जाती। आखिर पड़ोसियों ने डॉक्टर को बुलाया था। उसने कुछ दवाओं के साथ नींद कि इंजेक्शन भी दी थी। नन्हा बंटू कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। इतने सारे लोगों के बीच में अपने चाचा को नहीं पाकर उसने कई बार समीर से पूछा था "चाचा कां ऐं?
और समीर किसी तरह से बस इतना ही कह पाया था "तुम्हारे लिए मिठाई लाने गए हैं, अभी आ जायेंगे।" और वह उसकी यादों से दूर भागने कि प्रयास में लग गया था।
एक असफल प्रयास.........
११ जनवरी २००९, सिकंदराबाद।