Sunday, August 5, 2012

ख्वाहिश

कौन कहता है नशे की इल्म मुझको है नहीं
मैं आज भी अश्कों को पी कर झूम लेता हूँ

फिर मुझे जीने की ख्वाहिश हो गयी शायद
मैं हर सुबह फूलों को खिलते देख लेता हूँ

मेरी हस्ती किसी के रूठने से खौफ खाती है
किसी के मुस्कराहट में मैं खुद को ढूंढ लेता हूँ

जगह थोड़ी सी देखो छोड़ दो यारों मेरे जानिब
किसी के साथ की मैं ख्वाब अब भी देख लेता हूँ

कई बरसों से रंजिश थी खुदा से रात दिन मुझको
झुका के सिर दुआ उसकी मैं अब दिन रात लेता हूँ