मेरे ह्रदय
चलो उठो
बैठो नहीं
बैठे हो तुम..
तो थम जाता है जैसे
सब कुछ / सर्वत्र
यातनाएं हैं
पीड़ा भी
अविश्वास है
वेदना / व्यथा
संताप है
प्रलाप भी
पर तुम हो
तो ये सब है..
यही है मित्र
तुम्हारा प्रारब्ध
इसी से हो जीवित तुम
फिर ये
विलाप क्यों?
मेरे ह्रदय
चलो, उठो..
ना भूलो मित्र
यहीं पर
हर्ष है
आनंद भी
विश्वास है
आह्लाद, उमंग, सौभाग्य
रस है
मुस्कान भी
चेहरों पे रंग है
फूलों में गंध है
पक्षियों में संगीत
चित्त में स्वर है
ये भी है बंधु
तुम्हारा प्रारब्ध
इसी से जीवन है
सृष्टि में प्राण है..
मेरे ह्रदय
चलो, उठो
उठो, चलो..
थमो नहीं
यात्रा अनंत है
मार्ग अंतहीन है
पथ पर कांटे सही
पुष्प भी अपार हैं
फिर ये
विलाप क्यों?
मेरे ह्रदय
चलो उठो..
Manoj
24.05.2013