Friday, May 24, 2013

मेरे ह्रदय

मेरे ह्रदय
चलो उठो
बैठो नहीं
बैठे हो तुम..
तो थम जाता है जैसे
सब कुछ / सर्वत्र

यातनाएं हैं
पीड़ा भी
अविश्वास है
वेदना / व्यथा
संताप है
प्रलाप भी
पर तुम हो
तो ये सब है..
यही है मित्र
तुम्हारा प्रारब्ध
इसी से हो जीवित तुम
फिर ये
विलाप क्यों?
मेरे ह्रदय
चलो, उठो..

ना भूलो मित्र
यहीं पर
हर्ष है
आनंद भी
विश्वास है
आह्लाद, उमंग, सौभाग्य
रस है
मुस्कान भी
चेहरों पे रंग है
फूलों में गंध है
पक्षियों में संगीत
चित्त में स्वर है
ये भी है बंधु
तुम्हारा प्रारब्ध
इसी से जीवन है
सृष्टि में प्राण है..
मेरे ह्रदय
चलो, उठो

उठो, चलो..
थमो नहीं
यात्रा अनंत है
मार्ग अंतहीन है
पथ पर कांटे सही
पुष्प भी अपार हैं

फिर ये
विलाप क्यों?
मेरे ह्रदय
चलो उठो..

Manoj
24.05.2013

Wednesday, May 22, 2013

फासला

मैं किसी के बेरुखी से क़त्ल यूँ होता रहा,
सांस भी चलती रही, खून भी बहता रहा...

बादलों में मुंह छुपाये आसमां रोता रहा,
हर तरफ पानी ही पानी, और मैं जलता रहा...

बेखुदी में होश किसको, होश की बातें करे,
लब्ज़ कुछ आये ज़हन में, और कुछ कहता रहा...

फासला इतना नहीं था दो दिलों के दरमियाँ,
पर मुझे जाना किधर था, और कहाँ चलता रहा...

आँख से अश्कों का दरिया रात दिन गिरता रहा,
कश्तियाँ डूबे कई, और मैं बहता रहा...

मैं किसी के बेरुखी से क़त्ल यूँ होता रहा,
सांस भी चलती रही, खून भी बहता रहा...

Manoj
22.05.2013