Friday, December 26, 2014

आत्मनिरीक्षण

सच कहो
जब मेरे सर्वस्व को
निर्वस्त्र कर
कुचलते हो
अस्तित्व को मेरे..

जब मेरी देह से
मेरी आत्मा तक को
तार-तार करते हुए
मेरे कण-कण का
हविष्य देते हो
अपने अहंकार के
भूखे अग्निकुंड में..

जब किसी दीमक की तरह
चाट कर
खोखला करते हो मुझे
घिनौने जोंक के तरह
रक्त-पान करते हो
ध्वस्त आस्था पर मेरे
नृत्य करते हो बेसुध..

और जब अपने
मिथ्याभिमान में मतान्ध हो
मेरे खंडित ह्रदय में
अपने नाखून गाड़
जयघोष करते हो..

तब सच कहो -
कृष्णहीन द्यूत-गृह में
नग्न मैं होती हूँ
या तुम?

Wednesday, December 24, 2014

पुनर्जन्म


जब अन्धकार की नैया पर
निष्प्राण सा बहता जाता हूँ
तब निश्छल चंचल लहरों से
मैं कविता सुनने लगता हूँ

अंतर्मन के दीवारों पर
कुछ रंग उमड़ने लगते हैं
फिर ह्रदय-पटल खुल जाता है
मैं चित्र बनाने लगता हूँ

तब बादल छँटने लगते हैं
फिर घना कुहासा हटता है
फिर चन्द्रकिरण इठलाती हैं
मैं शब्द पिरोने लगता हूँ

तब अंधकार घुटने टेके
किरणों पर शीष झुकाता है
मैं प्रकाशमय सुरगंगा में
फिर नैया खेने लगता हूँ

मैं फिर से हँसने लगता हूँ
मैं फिर से गाने लगता हूँ
मैं फिर से साँसे लेता हूँ
मैं फिर से जीने लगता हूँ..

Saturday, December 20, 2014

मुक्ति

क्यों बंधे हुए हैं कुण्ठा से
अवलम्ब भला क्यों दुष्टों का
क्या ऐसी घोर विवशता है
अब बहुत हुआ, अब और नहीं

चल तोड़ दें इन जंज़ीरों को
चल फेंक दें इस बैसाखी को
चल पार चलें सीमाओं के
अब बहुत हुआ, अब और नहीं

ये धर्मयुद्ध कैसा साथी
ये मानव रक्त पिपासा है
क्यों हरी धरा है लाल हुई
अब बहुत हुआ, अब और नहीं

था स्वच्छ ह्रदय तो अपना भी
क्यों दुष्टों ने कालिख भर दी
चल मल-मल के फिर चमका लें
अब बहुत हुआ, अब और नहीं

चल परे हटें इन झूठों से
इन धर्म के ठेकेदारों से
चल मानवता का लाज रखें
अब बहुत हुआ, अब और नहीं