Friday, January 10, 2014

प्रतिस्पर्धा

कोइ इधर
कोइ उधर
उन्मत्त / दिशाहीन
आँखों पे पट्टी
जर्जर / रक्तहीन
दौड़ रहे हैं सब
जाना है कहाँ
क्या है गंतव्य
ये कैसी होड़ है
ये कैसा दौड़ है...

रोको मत
टोको मत
ना डालो विघ्न
अत्यंत आवश्यक है
ये दिशाहीन दौड़
सम्बद्ध है ये
धावकों के उदराग्नि से
अर्थ के खोज में
निरर्थक ही सही
अनिवार्य है संभवतः
ये आमरण प्रतिस्पर्धा
मूर्ख! समझते नहीं तुम
क्यों ऐसी होड़ है
क्यों ऐसा दौड़ है

सही-गलत क्या
उचित-अनुचित क्या
किताबी शब्द मात्र
प्राचीन धारणाएं
विध्वस्त खंडहर के
खंडित पाषाण से..
वर्तमान महायुग का सिद्धांत
समझ लो मित्र
सोचो मत
समझो मत
दौड़ते रहो केवल
प्रकाशहीन पथ पे
यही सत्य है
इस स्पर्धा में निश्चित
जो जीता है
वही जीता है
जो हारा है
वो रोता है
तभी ऐसी होड़ है
तभी ऐसा दौड़ है...