Friday, December 26, 2014

आत्मनिरीक्षण

सच कहो
जब मेरे सर्वस्व को
निर्वस्त्र कर
कुचलते हो
अस्तित्व को मेरे..

जब मेरी देह से
मेरी आत्मा तक को
तार-तार करते हुए
मेरे कण-कण का
हविष्य देते हो
अपने अहंकार के
भूखे अग्निकुंड में..

जब किसी दीमक की तरह
चाट कर
खोखला करते हो मुझे
घिनौने जोंक के तरह
रक्त-पान करते हो
ध्वस्त आस्था पर मेरे
नृत्य करते हो बेसुध..

और जब अपने
मिथ्याभिमान में मतान्ध हो
मेरे खंडित ह्रदय में
अपने नाखून गाड़
जयघोष करते हो..

तब सच कहो -
कृष्णहीन द्यूत-गृह में
नग्न मैं होती हूँ
या तुम?

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