Wednesday, December 24, 2014

पुनर्जन्म


जब अन्धकार की नैया पर
निष्प्राण सा बहता जाता हूँ
तब निश्छल चंचल लहरों से
मैं कविता सुनने लगता हूँ

अंतर्मन के दीवारों पर
कुछ रंग उमड़ने लगते हैं
फिर ह्रदय-पटल खुल जाता है
मैं चित्र बनाने लगता हूँ

तब बादल छँटने लगते हैं
फिर घना कुहासा हटता है
फिर चन्द्रकिरण इठलाती हैं
मैं शब्द पिरोने लगता हूँ

तब अंधकार घुटने टेके
किरणों पर शीष झुकाता है
मैं प्रकाशमय सुरगंगा में
फिर नैया खेने लगता हूँ

मैं फिर से हँसने लगता हूँ
मैं फिर से गाने लगता हूँ
मैं फिर से साँसे लेता हूँ
मैं फिर से जीने लगता हूँ..

No comments:

Post a Comment