Wednesday, May 22, 2013

फासला

मैं किसी के बेरुखी से क़त्ल यूँ होता रहा,
सांस भी चलती रही, खून भी बहता रहा...

बादलों में मुंह छुपाये आसमां रोता रहा,
हर तरफ पानी ही पानी, और मैं जलता रहा...

बेखुदी में होश किसको, होश की बातें करे,
लब्ज़ कुछ आये ज़हन में, और कुछ कहता रहा...

फासला इतना नहीं था दो दिलों के दरमियाँ,
पर मुझे जाना किधर था, और कहाँ चलता रहा...

आँख से अश्कों का दरिया रात दिन गिरता रहा,
कश्तियाँ डूबे कई, और मैं बहता रहा...

मैं किसी के बेरुखी से क़त्ल यूँ होता रहा,
सांस भी चलती रही, खून भी बहता रहा...

Manoj
22.05.2013

3 comments:

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  2. Arey...kaun sa comment remove kiya author ne?? Maine kuchh remove nahin kiya bhai...

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